रंगों, सुगंधों और ताँबे से उपचार: रसोई से परे आयुर्वेद
अंग्रेज़ी में
पाँचों इंद्रियों से उपचार
आयुर्वेद हमारी पाँच इंद्रियों को पाँच तत्वों से जोड़ता है:
- सुनना (आकाश)
- स्पर्श (वायु)
- देखना और रंग (अग्नि)
- स्वाद (जल)
- गंध (पृथ्वी)
इसलिए संतुलन सिर्फ़ भोजन से नहीं आता। आपके कपड़ों के रंग, आसपास की खुशबू और आपके बर्तन भी आपके दोष को हल्का सहारा दे सकते हैं।
भाग 1: आपके दोष के लिए रंग
इन रंगों को अपने कपड़ों, चादरों, कुशन और दीवारों के लिए चुनें।
वात: गर्म और सौम्य
सबसे अच्छे: गर्म हल्के रंग, धूप जैसा पीला, हल्का हरा, थोड़ा लाल और नारंगी।
कम करें: बहुत ज़्यादा गहरा नीला, भूरा और काला, और बहुत भड़कीले रंग।
पित्त: ठंडे और कोमल
सबसे अच्छे: नीला, बैंगनी, जामुनी, नीला-हरा, सफ़ेद और चाँदी जैसा।
कम करें: लाल, नारंगी, ज़्यादा पीला या सुनहरा, और काला।
कफ: चमकीले और जीवंत
सबसे अच्छे: भारीपन और आलस्य दूर करने के लिए लाल, नारंगी, पीला और सुनहरा।
कम करें: गहरा नीला, ज़्यादा हरा या सफ़ेद जैसे फीके, भारी रंग।
हर रंग क्या करता है
- लाल: गर्मी और ऊर्जा देता है। वात और कफ शांत करता है, पर ज़्यादा हो तो पित्त बढ़ाता है।
- नारंगी: गर्म और बल देने वाला। वात और कफ के लिए अच्छा।
- पीला: समझ और स्पष्टता से जुड़ा। वात और कफ को संतुलित करता है।
- हरा: दिल और भावनाओं के लिए ताज़गी और शांति। पित्त शांत करता है।
- नीला: ठंडक और शांति। पित्त के लिए उत्तम।
- बैंगनी: जागरूकता और हल्केपन से जुड़ा। पित्त और कफ शांत करता है।
- सुनहरा: गर्म, वात और कफ के लिए। चाँदी जैसा: ठंडा, पित्त के लिए।
भाग 2: आपके दोष के लिए सुगंध
खुशबू सीधे दिमाग तक पहुँचती है और मन को जल्दी बदल सकती है।
वात: मीठी, गर्म, स्थिर करने वाली
संतरा, लौंग, इलायची, लैवेंडर, लोबान, हिना (मेहंदी) का इत्र
पित्त: ठंडी, मीठी, शांत करने वाली
चंदन, खस, मोगरा, गुलाब, पुदीना, लेमनग्रास, सौंफ़
कफ: गर्म, तीखी, ताज़गी देने वाली
नीलगिरी, दालचीनी, तुलसी, रोज़मेरी, कपूर, गुग्गुल
सुगंध के आसान उपयोग
- ध्यान के समय प्राकृतिक अगरबत्ती या धूप जलाएँ।
- डिफ़्यूज़र या गर्म पानी के कटोरे में एसेंशियल ऑयल की कुछ बूँदें डालें।
- कलाई पर थोड़ा इत्र लगाएँ।
- कमरे में मोगरा या गुलाब जैसे ताज़े फूल रखें।
त्वचा पर लगाने से पहले एसेंशियल ऑयल को हमेशा किसी कैरियर तेल में मिलाएँ। इन्हें कभी निगलें नहीं। कपूर और तेल छोटे बच्चों से दूर रखें। अस्थमा के रोगी धुएँ वाली अगरबत्ती और तेज़ खुशबू से बचें।
भाग 3: रोज़मर्रा में ताँबा और लोहा
ताँबे के बर्तन का पानी (ताम्र जल)
एक पारंपरिक भारतीय आदत: रात को साफ़ ताँबे के लोटे या गिलास में पीने का पानी भरें और सुबह पिएँ। आयुर्वेद कहता है कि ताँबा बढ़े हुए कफ को कम करने में मदद करता है।
- इसमें सिर्फ़ सादा पानी रखें। नींबू पानी, जूस, छाछ या दूध कभी ताँबे में न रखें।
- नींबू और नमक से नियमित साफ़ करें, फिर अच्छी तरह धो लें।
- भरोसेमंद जगह से शुद्ध, फ़ूड-ग्रेड ताँबा लें।
- इसे संयम से उपयोग करें, दिन में लगभग 1 से 2 गिलास। बाकी पानी स्टील या मिट्टी के बर्तन से पिएँ।
- विल्सन रोग या लिवर की समस्या वाले ताँबे का पानी न पिएँ।
लोहे की कढ़ाई में खाना
लोहे की कढ़ाई या तवे में खाना बनाने से भोजन में थोड़ा प्राकृतिक आयरन आता है, जो आयरन की कमी वाली कई महिलाओं और शाकाहारियों के लिए मददगार है। पुरुषों और जिनका आयरन पहले से ज़्यादा है, उन्हें आमतौर पर अतिरिक्त आयरन की ज़रूरत नहीं होती।
रत्नों और धातु के पानी के बारे में
पारंपरिक ग्रंथों में रत्नों और सोने-चाँदी से उपचार का भी वर्णन है। ये परंपरा और व्यक्तिगत आस्था के विषय हैं। ऐसा पानी कभी न पिएँ जिसमें पत्थर या गहने भिगोए गए हों, क्योंकि कुछ पत्थरों और धातुओं से हानिकारक पदार्थ निकल सकते हैं।
ज़रूरी बात
- रंग, सुगंध और ताँबे का पानी सहायक आदतें हैं, बीमारी का इलाज नहीं।
- नवजात शिशु के पीलिया में डॉक्टर और अस्पताल की सही लाइट थेरेपी ज़रूरी है, घर पर रंगों के उपाय नहीं।
आज यह करके देखें
अपनी अलमारी देखें। आज अपने दोष के अनुकूल एक रंग पहनें, और शाम को दोष के अनुकूल अगरबत्ती जलाएँ।
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